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रविवार, 2 अगस्त 2015

हेराका आन्दोलन और हमारा दायित्व



जब असम में था तो नागालैंड के दो सरकारी अफसरों से जुड़ा एक प्रसंग सुनने को मिला था. इन दोनों का प्रशासनिक सेवा के लिए चयन हुआ फिर दोनों को ट्रेनिंग के लिए बुलाया गया. ट्रेनिंग में भारत के अलग-अलग हिस्सों से चयनित अफसर आये हुए थे. ट्रेनिंग सत्र के दौरान हर रविवार शाम में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे. इसी तरह के एक सत्र का विषय था "भारत की सांस्कृतिक विरासत और विविधताएं".
प्रशिक्षण लेने वालों में से सबसे कहा गया कि आप भारत के जिस भी हिस्से से आयें हैं उसकी संस्कृति, परिवेश, रहन-सहन, समाज, कला इन सबके बारे में सामने आकर बताएं ताकि हम सबको भारत के अलग-अलग जगहों के बारे में, वहां के लोगों के बारे में , वहां की कला-संस्कृति के बारे में जानने का मौका मिले. सब आते अपने-अपने विचार और अनुभव बांटते. फिर बारी आई नागालैंड से आये युवकों की. मंच पर आते ही उन युवकों से कहा गया, पूर्वोत्तर के बारे में हम सब की जानकारी बहुत कम है, पर सुना है वहां की सांस्कृतिक विविधताएं अद्भुत है, तो आप उसके बारे में कुछ बताओ.
आपको तो पता ही हैं कि पूर्वोत्तर के लगभग सारे छोटे राज्यों की बहुसंख्यक आबादी मिशनरियों के धुआंधार प्रचार के कारण ईसाई मत में दीक्षित हो चुकी है. इन दोनों युवकों ने जब से आँखें खोली थी, अपने चारों तरफ केवल चर्च, ईसाई त्योहार, बाईबिल, चर्च के नियम यही सब देखा था. इसलिए उन दोनों ने मंच से वही सब बताना शुरू कर दिया. वहां बैठे हुए बड़े अधिकारियों ने दोनों को लगभग डांटते हुए कहा, ये क्या बात बता रहे हो तुमलोग, हमलोगों ने तो सोचा था कि हमें नागालैंड के बारे में कई नवीन और रोचक जानकारियों सुनने को मिलेंगी और तुम हो कि चर्च और ईसाईयत की बातें बता रहे हो, यही सब सुनना है तो हमारे यहाँ चर्च और फादर नहीं है क्या? दोनों मंच से उतार दिए गए.
हम भारत से बाहर जातें हैं तो दुनिया हमसे वेद के बारे में पूछती है, उपनिषदों के बारे में पूछती है, योग और अध्यात्म पर सवाल करती है, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और वैदिक संस्कृति के बारे में जानना चाहती है, राम, कृष्ण, बुद्ध ,महावीर और आर्यभट्ट के बारे में पूछती है , हमारी सांस्कृतिक विविधताओं के बारे में सवाल करती है, क्योंकि ये चीजें हमारी राष्ट्रीय संस्कृति का आधार है, हमारी धरोहर है। दुनिया में योग, अध्यात्म, गीता, रामायण, महाभारत और राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर से हमारी और हमारे देश की पहचान है, मगर दुर्भाग्यवश मतांतरण के धंधे ने हमारे अपने लोगों को इन चीजों से काट दिया है, अब वो बाहर के देशों से आयातित चीजों से खुद को जोड़ कर उस पर गर्व करते हैं.
बाकी जगह तो 'मानसिकता परिवर्तन' की यह क्रिया कुछ कम भी है पर दुर्भाग्यवश पूर्वोत्तर के लोगों को पूरी तरह हमारी मूलधारा से काट दिया गया है, विदेशी लोग और विदेशी धर्म के प्रभाव से आहिस्ता-आहिस्ता वहां के समाज को नष्ट होते देखना बेहद दु:खद है, नागालैंड, मिजोरम और मेघालय की नई पीढ़ी को राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, विवेकानंद से कई गुना अधिक जानकारी मोजेज़ , जॉब , ईसा, डेविड और सोलोमन जैसे मध्य-पूर्व के देशों में जन्में पैगम्बरों के बारे में है, उसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से अधिक आकर्षित पश्चिम के लन्दन और न्यूयार्क जैसे शहर करतें हैं .
सुखद बात ये है कि विधर्मी छाया में नष्ट हो रहे नागा समाज को शुद्ध रखने का प्रयास नागालैंड की प्रसिद्ध क्रांतिकारी रानी माँ गाइदिन्लुयू की प्रेरणा से चलाये जा रहे "हेराका आन्दोलन" के द्वारा चलाया जा रहा है. (हेराका का अर्थ है 'शुद्ध और पवित्र'). रानी माँ का सपना था कि नागाओं की कम से कम तीन जनजाति जेमी, लियांगमाई और रोंगमाई (जिनका मतान्तरण अब तक नहीं हुआ है और जो पूर्वोत्तर के कई राज्यों में बिखरें हुए हैं) को एक साथ लाकर इस आन्दोलन को गति दी जाए और नागा समाज को विधर्मी प्रभाव से बचाया जाए. सुलगते नागालैंड में उम्मीद का दीपक हेराका और उसके कार्यकर्ताओं से ही हैं, जो प्राणपन से अपने जान की परवाह किये बैगैर, संगीनों के साए में नागाओं में राष्ट्रीयता का अलख जगा रहे हैं.

रानी माँ के स्वप्न को साकार करने में जुटे 'हेराका आन्दोलन' के कार्यकर्ताओं के सुप्रयासों को सारा देश जाने इसके लिए क्या आप इस पोस्ट को आगे नहीं बढ़ाएंगे ?


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