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रविवार, 2 अगस्त 2015

हेराका आन्दोलन और हमारा दायित्व



जब असम में था तो नागालैंड के दो सरकारी अफसरों से जुड़ा एक प्रसंग सुनने को मिला था. इन दोनों का प्रशासनिक सेवा के लिए चयन हुआ फिर दोनों को ट्रेनिंग के लिए बुलाया गया. ट्रेनिंग में भारत के अलग-अलग हिस्सों से चयनित अफसर आये हुए थे. ट्रेनिंग सत्र के दौरान हर रविवार शाम में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे. इसी तरह के एक सत्र का विषय था "भारत की सांस्कृतिक विरासत और विविधताएं".
प्रशिक्षण लेने वालों में से सबसे कहा गया कि आप भारत के जिस भी हिस्से से आयें हैं उसकी संस्कृति, परिवेश, रहन-सहन, समाज, कला इन सबके बारे में सामने आकर बताएं ताकि हम सबको भारत के अलग-अलग जगहों के बारे में, वहां के लोगों के बारे में , वहां की कला-संस्कृति के बारे में जानने का मौका मिले. सब आते अपने-अपने विचार और अनुभव बांटते. फिर बारी आई नागालैंड से आये युवकों की. मंच पर आते ही उन युवकों से कहा गया, पूर्वोत्तर के बारे में हम सब की जानकारी बहुत कम है, पर सुना है वहां की सांस्कृतिक विविधताएं अद्भुत है, तो आप उसके बारे में कुछ बताओ.
आपको तो पता ही हैं कि पूर्वोत्तर के लगभग सारे छोटे राज्यों की बहुसंख्यक आबादी मिशनरियों के धुआंधार प्रचार के कारण ईसाई मत में दीक्षित हो चुकी है. इन दोनों युवकों ने जब से आँखें खोली थी, अपने चारों तरफ केवल चर्च, ईसाई त्योहार, बाईबिल, चर्च के नियम यही सब देखा था. इसलिए उन दोनों ने मंच से वही सब बताना शुरू कर दिया. वहां बैठे हुए बड़े अधिकारियों ने दोनों को लगभग डांटते हुए कहा, ये क्या बात बता रहे हो तुमलोग, हमलोगों ने तो सोचा था कि हमें नागालैंड के बारे में कई नवीन और रोचक जानकारियों सुनने को मिलेंगी और तुम हो कि चर्च और ईसाईयत की बातें बता रहे हो, यही सब सुनना है तो हमारे यहाँ चर्च और फादर नहीं है क्या? दोनों मंच से उतार दिए गए.
हम भारत से बाहर जातें हैं तो दुनिया हमसे वेद के बारे में पूछती है, उपनिषदों के बारे में पूछती है, योग और अध्यात्म पर सवाल करती है, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और वैदिक संस्कृति के बारे में जानना चाहती है, राम, कृष्ण, बुद्ध ,महावीर और आर्यभट्ट के बारे में पूछती है , हमारी सांस्कृतिक विविधताओं के बारे में सवाल करती है, क्योंकि ये चीजें हमारी राष्ट्रीय संस्कृति का आधार है, हमारी धरोहर है। दुनिया में योग, अध्यात्म, गीता, रामायण, महाभारत और राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर से हमारी और हमारे देश की पहचान है, मगर दुर्भाग्यवश मतांतरण के धंधे ने हमारे अपने लोगों को इन चीजों से काट दिया है, अब वो बाहर के देशों से आयातित चीजों से खुद को जोड़ कर उस पर गर्व करते हैं.
बाकी जगह तो 'मानसिकता परिवर्तन' की यह क्रिया कुछ कम भी है पर दुर्भाग्यवश पूर्वोत्तर के लोगों को पूरी तरह हमारी मूलधारा से काट दिया गया है, विदेशी लोग और विदेशी धर्म के प्रभाव से आहिस्ता-आहिस्ता वहां के समाज को नष्ट होते देखना बेहद दु:खद है, नागालैंड, मिजोरम और मेघालय की नई पीढ़ी को राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, विवेकानंद से कई गुना अधिक जानकारी मोजेज़ , जॉब , ईसा, डेविड और सोलोमन जैसे मध्य-पूर्व के देशों में जन्में पैगम्बरों के बारे में है, उसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से अधिक आकर्षित पश्चिम के लन्दन और न्यूयार्क जैसे शहर करतें हैं .
सुखद बात ये है कि विधर्मी छाया में नष्ट हो रहे नागा समाज को शुद्ध रखने का प्रयास नागालैंड की प्रसिद्ध क्रांतिकारी रानी माँ गाइदिन्लुयू की प्रेरणा से चलाये जा रहे "हेराका आन्दोलन" के द्वारा चलाया जा रहा है. (हेराका का अर्थ है 'शुद्ध और पवित्र'). रानी माँ का सपना था कि नागाओं की कम से कम तीन जनजाति जेमी, लियांगमाई और रोंगमाई (जिनका मतान्तरण अब तक नहीं हुआ है और जो पूर्वोत्तर के कई राज्यों में बिखरें हुए हैं) को एक साथ लाकर इस आन्दोलन को गति दी जाए और नागा समाज को विधर्मी प्रभाव से बचाया जाए. सुलगते नागालैंड में उम्मीद का दीपक हेराका और उसके कार्यकर्ताओं से ही हैं, जो प्राणपन से अपने जान की परवाह किये बैगैर, संगीनों के साए में नागाओं में राष्ट्रीयता का अलख जगा रहे हैं.

रानी माँ के स्वप्न को साकार करने में जुटे 'हेराका आन्दोलन' के कार्यकर्ताओं के सुप्रयासों को सारा देश जाने इसके लिए क्या आप इस पोस्ट को आगे नहीं बढ़ाएंगे ?


बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

दीमापुर - विशाल नदी के निकट शहर

उत्तर पूर्व के सबसे तेजी से बढ़ते शहरों में से एक माना जाने वाला दीमापुर, नगालैंड के लिए प्रवेश द्वार है। एक समय में यह साम्राज्‍य की समृद्ध राजधानी थी, आज भले ही यह राज्‍य की राजधानी नहीं है, लेकिन यहां का इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और यहां की सुविधाएं किसी राजधानियों में उपलबध सुविधाओं से कम नहीं हैं। दीमापुर शब्‍द दिमासा शब्‍द से आया है, जिसमें 'दि' यानी पानी, 'मा' यानी बड़ा या विशाल और 'पुर' यानी शहर है। इस प्रकार, दीमापुर का मतलब विशाल नदी के निकट शहर हुआ। अतीत में शहर से धनसिरी नदी बहती थी।
दीमापुर तस्वीरें, कछारी खंडहर - एक छवि
इतिहास- 
दीमापुर शहर का एक लंबा इतिहास है, क्‍योंकि दीमासास के साम्राज्‍य की राजधानी हुआ करती थी, जो कछारी द्वारा शासित थी। पुरातात्विक अवशेषों, जो दीमापुर के आस-पास अभी भी फैले हुए पाये जाते हैं, से पता चलता है कि राजधानी पूरी तरह से महफूज़ शहर था।
दिमासा साम्राज्‍य आसपास के मैदानों पर फैला हुआ था और आज जो भी असम का ऊपरी हिस्‍सा है, वहां पड़ता था। इस प्राचीन शहर के प्रमाण यहां के कुछ मंदिरों, तटों, तटबंधों, आदि पर पाये जाते हैं। ये ऐतिहासिक स्थल इस बात के भी प्रमाण हैं कि हिंदू धर्म दिमासास का प्रचलित धर्म था।
हालांकि, यह भी निष्कर्ष निकाला गया है गया है कि दिमासास गैर आर्य थे और बड़े पैमाने पर इस भाग पर प्राचीन आदिवासी सत्तारूढ़ थे।आधुनिक इतिहास में भी, दीमापुर ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्‍योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यह ब्रिटिश भारत और शाही जापान के बीच कार्रवाई का केंद्र था।
दीमापुर से होते हुए जापानियों द्वारा सहायता के लिये नयी सेना लाने के कारण कोहिमा पर हमला हुआ और यह हमला द्वितीय विश्व युद्ध की महत्वपूर्ण लड़ाइयों में से एक था। इस तरह कई इतिहासकार दीमापुर को 'ईंट शहर' कहने लगे।

एक यात्री के लिए एक छोटा सा भूगोल

दीमापुर का वर्तमान भूगोल ऐसी है कि यह नगालैंड के पश्चिमी भाग में निहित है, जो दक्षिण-पूरब में कोहिमा जिले, पश्चिम में कार्बी आंगलोंग जिले (असम में) और उत्तर में गोलाघाट जिले (असम में) से घिरा है। दीमापुर राज्य में एक मात्र शहर है जो रेल और हवाई सेवाओं से जुड़ा है ।
नागालैंड राज्य और लगातार भी मणिपुर के लिए जीवन रेखा के रूप में, दीमापुर उत्तर पूर्व भारत के तंत्रिका केन्द्रों में से एक है। राष्ट्रीय राजमार्ग 39 कोहिमा, इम्‍फाल को देश के अन्य भागों के साथ जोड़ता है। म्यांमार के साथ मोरेह सीमा भी दीमापुर से गुजरती है।

कला और संस्कृति पर्यटकों के लिए रुचिकर भाग

नागा हथकरघा बहुत प्रसिद्ध है और दुनिया भर में लोग इसे धारण करते हैं। दीमापुर अभी भी सबसे बड़े हथकर्घा बुनकरों के लिये जाना जाता है और नागा शॉल और अन्‍य कलाकृतियां यहां से देश के अन्‍य भागों में निर्यात की जाती हैं। इस जगह की सम्रद्ध कला एवं संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने उत्तर पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की है। यहाँ, एक संग्रहालय नगालैंड की कलाकृतियों को सुरक्षित रखता है और केन्द्र नियमित रूप से सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन करता है।

आंतरिक रेखा प‍रमिट

यदद्यपि बाकी का नागालैंड संरक्षित क्षेत्र अधिनियम के तहत आता है, राज्‍य में दीमापुर एक मात्र शहर है, जो इस अधिनियम से बाहर है। इसलिये दीमापुर जाने के लिये पर्यटकों को आंतरिक रेखा परमिट लेना अनिवार्य नहीं होता। हालांकि शहर के लिये पर्यटकों को आंतरिक रेखा परमिट नहीं लेना होता है, लेकिन शहर से आगे जाने के लिये उन्‍हें प्रतिबंधित क्षेत्र में जाने का परमिट लेना होता है। प्रतिबंधित इलाकों में जाने के लिये परमिट लेने की प्रक्रिया बहुत साधारण है। और कोई भी डिप्‍टी कमिश्‍नर के कार्यालय जाकर अपने प्रमाण पत्र दिखाकर परमिट प्राप्‍त कर सकता है। प्रतिबंधित इलाकों में जाने के लिये परमिट निम्‍न कार्यालयों से भी मिल सकते हैं-
• डिप्‍टी रेजिडेंट कमिश्‍नर, नागालैंड हाउस, नई दिल्‍ली• डिप्‍टी रेजिडेंट कमिश्‍नर, नागालैंड हाउस, कोलकाता• असिस्‍टेंट रेजिडेंट कमिश्‍नर, गुवाहाटी एवं शिलॉन्‍ग• डिप्‍टी कमिश्‍नर ऑफ दीमापुर, कोहिमा और मोकोकचुंग

दीमापुर में पर्यटन आकर्षण

बेहतरीन ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि के होने के कारण और पूर्वोत्‍तर के एक महत्‍वपूर्ण शहर होने के नाते, दीमापुर में घूमने के लायक कई स्‍थान हैं।
दीज्फे हस्तशिल्प गांव: मुख्‍य शहर से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित, दीज्फे हस्तशिल्प गांव नागालैंड हैंडलूम एंड हैंडीक्राफ्ट डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा संचालित है। इस क्राफ्ट विलेज का मकसद राज्‍य की बेहतरीन कलाओं, हैंडलूम और हस्‍तशिल्‍प को बढ़ावा देना है। दुर्लभ हस्‍तशिल्‍प, वुड क्राफ्ट और बैम्‍बू क्राफ्ट इस क्राफ्ट विलेज में देखी जा सकती हैं।
रंगापहाड़ रिजर्व फॉरेस्‍ट: रंगापहाड़ संरक्षित वन यहां के दुलर्भ एवं खतरनाक पक्षियों एवं जानवरों के गढ़ के रूप में जाना जाता है। यह दीमापुर के मुख्‍य आकर्षणों में से एक है।
चुमुकेदिमा: कभी असम के नागाओं के पहाड़ी जिलों का मुख्‍यालय रह चुका चुमुकेदिमा को अब पर्यटन स्‍थल के रूप में विकसित किया गया है, जहां से कारबी-अंगलोंग जिलों समेत पूरे दीमापुर को देखा जा सकता है। चुमुकेदिमा शहर से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
रुज़ाफेमा: एक छुट्टी जिसमें आपको स्‍थानीय लोगों की हचलच न सुनायी दे, तब तक वो पूरी नहीं होती। रुज़ाफेमा एक आदर्श स्‍थान है, जहां स्‍थानीय हस्‍तशिल्‍प से सजे रंग-बिरंगे बाजार देख सकते हैं। यह वो जगह है, जहां पर्यटक आसानी से स्‍थानीय लोगों से घुल-मिल जाते हैं।
ट्रिप्‍पल फॉल्‍स: दीमापुर घूमने जायें तो ट्रिप्‍पल फॉल्‍स जरूर देखें। जैसा कि नाम से ही लग रहा है, यहां पानी के तीन झरने हैं, जो एक साथ बहते हैं, यह ट्रैक्‍कर्स और रोमांच पसंद करने वाले लोगों के लिय आदर्श जगह है। 

मणिपुर: नाकेबंदियों में पिसते आम लोग

पूर्वोत्तर में उग्रवाद प्रभावित पर्वतीय राज्य मणिपुर के लोग बीते लगभग ढाई महीने से दो आदिवासी संगठनों की ओर से जारी अलग अलग आर्थिक नाकेबंदियों के बीच पिस रहे हैं. राज्य की कांग्रेस सरकार चुनावी फायदा देख रही है.


दो नेशनल हाइवे के जरिए यह राज्य देश के बाकी हिस्सों से जुड़ा है. लेकिन बीती 31 जुलाई को आधी रात से पहले एक हाइवे की नाकेबंदी की गई और फिर 21 दिनों बाद दूसरे की. इन दोनों हाइवे को मणिपुर की जीवनरेखा कहा जाता है. लेकिन नाकेबंदी के दबाव में यह जीवनरेखा लगातार कमजोर होती जा रही है. खाने-पीने के सामान से लेकर रोजमर्रा की जरूरत की तमाम वस्तुएं इनसे होकर ही राज्य में पहुंचती हैं हाइवे पर नाकेबंदी के चलते ट्रकों की आवाजाही ठप है. नतीजतन राज्य में जरूरी वस्तुओं की भारी किल्लत हो गई है. इसकी वजह से आम लोगों की परेशानियां लगातार बढ़ती ही जा रही हैं.
नए जिले पर गतिरोध
दरअसल, यह पूरा विवाद एक नए जिले के गठन के सवाल पर पैदा हुआ है. कूकी जनजाति के लोग लंबे अरसे से सदर सदर हिल्स को नया जिला बनाने की मांग कर रहे हैं. लेकिन जब सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया तो उनके संगठन सदर हिल्स जिला मांग समिति ने 31 जुलाई को एक हाइवे की नाकेबंदी कर दी. दूसरी ओर, राज्य में रहने वाले नगा जनजाति के लोग इस मांग के खिलाफ हैं. उनका कहना है कि नगा बहुल इलाकों को नए जिले में शामिल नहीं करने दिया जाएगा. सदर हिल्स को जिले का दर्जा देने के प्रयासों के विरोध में नगा संगठन यूनाइटेड नगा काउंसिल ने 21 अगस्त से दूसरे और आखिरी हाइवे की नाकेबंदी कर दी है. यह पर्वतीय राज्य अपनी जरूरतों के लिए देश के दूसरे राज्यों पर आधारित है. लेकिन हाइवे की नाकेबंदी के कारण बाहर से सामान यहां नहीं पहुंच पा रहा है. इससे नगालैंड-मणिपुर सीमा पर ट्रकों और माल ढोने वाले दूसरे वाहनों की सैकड़ों मील लंबी कतार लग गई है. आंदोलनकारियों ने राज्य में घुसने की कोशिश कर रहे कई वाहनों को भी जला दिया है. हरियाणा से गेहूं लेकर मणिपुर जाने वाले हरजिंदर बीते 25 दिनों से नाकेबंदी खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं. उनकी तरह सैकड़ों ट्राइवर हाइवे पर दिन काट रहे हैं. सरकार ने सुरक्षा बलों की निगरानी में कुछ जरूरी वस्तुएं मंगाई जरूरी हैं. लेकिन वह मांग के मुकाबले नाकाफी है.
जरूरी चीजों की किल्लत
बाहर से दो महीने से भी ज्यादा समय से जरूरी चीजों की सप्लाई नहीं होने की वजह से बाजार में कुछ भी उपलब्ध नहीं है. नतीजतन जो चीजें हैं उनकी कीमतें आसमान छू रही हैं. मिसाल के तौर पर चार सौ रुपये का रसोई गैस सिलेंडर दो हजार रुपये में बिक रहा है. राजधानी इंफाल में एक गृहिणी वाई चोंबाम कहती हैं, "आखिर हम पैसे कहां से लाएं? हम एक सिलेंडर के लिए दो हजार रुपये खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं. समझ में नहीं आता कि आगे क्या होगा? बाकी चीजों का भी यही हाल है." पेट्रोल डेढ़ से दो सौ रुपये लीटर तक मिल रहा है. हालात पर काबू पाने के लिए सरकार ने दिन में महज कुछ घंटों के लिए पेट्रोल पंपों को खोलने की अनुमति दी है. अपनी बारी के इंतजार में तमाम वाहन मालिक दो दो दिनों तक कतार में खड़े इंतजार कर रहे हैं. आलू 50 रुपये किलो बिक रहा है तो प्याज सौ रुपये. दो महीने पहले तक 20-25 रुपये प्रति किलों बिकने वाला चावल के लिए अब कम से कम साठ रुपये खर्च करने पड़ते हैं. सरकार ने व्यापारियों को कालाबाजारी के खिलाफ सख्त चेतावनी दी है. लेकिन हालात जस के तस हैं. आसमान छूती महंगाई से आजिज आकर राज्य की महिलाओं ने राजधानी इंफाल में प्रदर्शन भी किया है.
सरकार की चुप्पी
लंबी आर्थिक नाकेबंदी के बावजूद राज्य में कांग्रेस की अगुवाई वाली साझा सरकार ने अब तक इस मामले में कोई ठोस पहल नहीं की है. विभिन्न संगठनों ने उससे नाकेबंदी खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की है. लेकिन उसने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है. मुख्यमंत्री ओकराम ईबोबी सिंह ने अब तक इस गतिरोध पर कोई टिप्पणी नहीं की है. केंद्र सरकार ने भी सुरक्षा बलों की कुछ बटालियनों को भेज कर अपना कर्त्तव्य पूरा कर लिया है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सरकार की चुप्पी की ठोस राजनीतिक वजह है. राज्य में अगले साल फऱवरी में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसलिए सरकार किसी तबके को नाराज नहीं करना चाहती. वह चाहती है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे. नगा और कुकी में से किसी भी जनजाति की नाराजगी चुनाव में किसी राजनीतिक पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है. ऐसे में सरकार चाहती है कि थक हार कर दोनों संगठन खुद ही नाकेबंदी खत्म कर लें.
आर-पार की लड़ाई की तैयारी
हाइवे की नाकेबंदी करने वाले दोनों संगठन इस बार आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं. सदर हिल्स जिला मांग समिति के एक प्रवक्त पी. खोंगजाम कहते हैं, "हम लंबे समय से सदर हिल्स को जिले का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं. लेकिन सरकार ने अब तक इस पर ध्यान नहीं दिया है. इसलिए आखिरी विकल्प के तौर पर हमने नाकेबंदी का रास्ता चुना. अब मांग पूरी नहीं होने तक यह लड़ाई जारी रहेगी." समिति का कहना है कि प्रस्तावित जिले का क्षेत्रफल 1,696 वर्ग किलोमीटर और आबादी 1.9 लाख है. दूसरी ओर, नगा संगठन यूनाइटेड नगा काउंसिल ने भी अपने पैर पीछे नहीं खींचने की बात कही है. उसकी दलील है कि जिन इलाकों को मिला कर नया जिला बनाने की बात हो रही है उनमें से ज्यादातर नगा-बहुल है. नगा इलाकों को किसी भी कीमत पर नए जिले में शामिल नहीं किया जा सकता. सदर हिल्स इलाका फिलहाल सेनापति जिले में है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि किसी भी नए जिले के गठन से पहले कुछ तथ्यों को ध्यान में रखना जरूरी है. पूरे राज्य का क्षेत्रफल असम के एक जिले से भी कम है. इसके अलावा राज्य में पहले से ही नौ जिले हैं. ऐसे में एक और नए जिले का गठन तार्किक नहीं है. इससे राज्य पर आर्थिक बोझ भी बढ़ेगा. पर्यवेक्षक कहते हैं कि दोनों जनजातियों के बीच संभावित हिंसक संघर्ष की आशंका से ही केंद्र या राज्य सरकार नाकेबंदी हटाने के लिए सुरक्षा बलों का इस्तेमाल करने से बच रही है.
पुराना है नाकेबंदी का इतिहास
मणिपुर में नाकेबंदी और पाबंदी का इतिहास काफी पुराना है. यहां विभिन्न संगठन अक्सर सरकार पर दबाव बनाने के लिए इस हथियार का इस्तेमाल करते रहे हैं. वर्ष 2005 में 18 जून को एकता दिवस के तौर पर मनाने के राज्य सरकार के फैसले के विरोध में अखिल नगा छात्र संघ ने राज्य में 52 दिनों तक आर्थिक नाकेबंदी की थी. इसके बाद बीते साल जब सरकार ने अलगाववादी नगा नेता और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड के महासचिव टी मुइवा के मणिपुर में प्रवेश पर पाबंदी लगाई थी तो नगा संगठनों ने 68 दिनों तक नाकेबंदी की थी. इसके अलावा दूसरे संगठन भी जब तब अपनी मांगों के समर्थन में मणिपुर की जीवनरेखा कहे जाने वाले हाइवे का दम घोंटते रहे हैं. राज्य के वित्त विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, ताजा नाकेबंदी के चलते राज्य को ढाई सौ करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो चुका है. यह देश का अकेला ऐसा राज्य है जब अपनी मर्जी के मुताबिक खबरें नहीं छपने पर विभिन्न उग्रवादी संगठन मीडिया पर पाबंदी लगा देते हैं. कभी वे किसी अखबार का प्रकाशन रोक देते हैं तो कभी बिक्री.
समाधान कब तक
आखिर नाकेबंदी की मौजूदा समस्या कब खत्म होगी? राज्य के लोग रोज यही सवाल पूछ रहे हैं. लेकिन किसी के पास इस लाख टके के सवाल का कोई जवाब नहीं है. खाने पीने से लेकर तमाम दूसरी वस्तुओं की कीमतें दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही हैं. लेकिन न तो सरकार कुछ कर रही है और न ही कूकी और नगा संगठन अपनी-अपनी नाकेबंदी खत्म करने को तैयार हैं. ऐसे में आम लोग शायद अभी लंबे समय तक दो चक्की के पाटों के बीच पिसने को मजबूर हैं.
रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता
संपादन: ओ सिंह

उग्रवाद में घिरा पूर्वोत्तर

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और उग्रवाद के बीच आजादी के समय से ही चोली-दामन का साथ रहा है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि यह दोनों एक-दूसरे की पहचान बन चुके हैं. उग्रवाद की समस्या पहेली बन कर रह गई है.


नगालैंड में कोई डेढ़ दशक से जारी शांति प्रक्रिया इसका जीवंत उदाहरण है. इसी तरह असम में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम यानी अल्फा के साथ बातचीत की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ सकी है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर इसके समाधान का सही तरीका क्या है और क्या संबंधित पक्ष इसके समाधान के प्रति सचमुच गंभीर हैं ?
उग्रवाद की समस्या
पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों में कोई भी राज्य इस समस्या से अछूता नहीं रहा है. इन तमाम राज्यों में समस्या की मूल वजह यह है कि यह लोग आजादी के इतने सालों बाद भी खुद को भारत का हिस्सा नहीं मानते. पहले इन इलाकों में राजाओं या कबीलों का शासन था. अब भी इन लोगों को लगता है कि भारत में जबरन उनका विलय किया गया है. इसलिए देश के दूसरे राज्यों से जाने वालों को खासकर मणिपुर व नगालैंड जैसे राज्यों में अब भी हिंदुस्तानी कहा जाता है. पहले ज्यादातर राज्य एक साथ थे. बाद में राजनैतिक समीकरणों के चलते उनको अलग राज्य का दर्जा दिया गया. इनके अलावा नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एरिया यानी नेफा कहे जाने वाले इलाके को अरुणाचल प्रदेश का नाम दिया गया. उग्रवाद की समस्या ने सबसे पहले म्यामांर से सटे मिजोरम में सिर उठाया था. वहां लालदेंगा की अगुवाई में कोई दो दशक तक हिंसक आंदोलन हुआ था. लेकिन बाद में केंद्र सरकार के साथ समझौते के तहत वहां शांति बहाल हुई और फिलहाल वही राज्य सबसे शांत माना जाता है. मिजोरम की तर्ज पर बाकी राज्यों में भी संप्रभुता की मांग में उग्रवाद ने सिर तो उठाया. लेकिन वहां समाधान का वह तरीका कारगर नहीं हो सका जिसके चलते मिजोरम में स्थायी शांति बहाल हुई थी. मिसाल के तौर पर नगालैंड को गिनाया जा सकता है.
नगा समस्या
नगालैंड में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) ने उग्रवाद का बिगुल बजाया था. बाद में वह गुट दो हिस्से में बंट गया. नगा संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड यानी एनएससीएन का इसाक-मुइवा गुट असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नगा-बहुल इलाकों को मिला कर वृहत्तर नगालैंड के गठन और संप्रभुता की मांग कर रहा है. केंद्र सरकार ने कोई 15 साल पहले संगठन के इसाक-मुइवा गुट के साथ शांति प्रक्रिया शुरू की थी. लेकिन देश-विदेश में दर्जनों बैठकों के बावजूद राज्य की जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया है. नतीजा यह रहा कि जो शांति प्रक्रिया उग्रवाद से जूझ रहे पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक मिसाल बन सकती थी, वह खुद ही अनिश्चितता के भंवर में फंस गई है. राज्य में सरकार चाहे किसी की भी हो, उग्रवादियों की समानांतर सरकार चलती है. नगा उग्रवादी पड़ोसी अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में भी सक्रिय हैं. नगाबहुल इलाकों को मिला कर ग्रेटर नगालैंड के गठन की मांग के चलते इलाके में अक्सर हिंसा होती रही है जिसकी आंच पड़ोसी राज्यों तक भी पहुंचती है.
मणिपुर
नगालैंड से सटे मणिपुर में उग्रवाद के पनपने की सबसे मजबूत वजह उसका म्यामांर की सीमा से सटा होना है. पूर्वोत्तर में सबसे ज्यादा सक्रिय उग्रवादी गिरोह इसी राज्य में हैं. केंद्र सरकार ने उग्रवाद के दमन के लिए इलाके में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम तो लागू कर रखा है. लेकिन अब तक इस अधिनियम ने मुश्किलें ही ज्यादा पैदा की हैं. उग्रवादियों की तादाद लगातार बढ़ती ही जा रही है. नगालैंड की तरह यहां कोई शांति प्रक्रिया भी शुरू नहीं की गई है. वरिष्ठ राजनीतिक पर्यवेक्षक के. हेमेंद्र सिंह सवाल करते हैं, ‘आखिर शांति प्रक्रिया किसके साथ शुरू करे सरकार ? असम और नगालैंड में तो उग्रवादी संगठनों की तादाद कम है और उनके साथ बातचीत के जरिए शांति बहाल करने की कोशिश हो सकती है. लेकिन यहां कम से कम तीन दर्जन गुट हैं. उन सबको शांति प्रक्रिया के लिए एक छतरी के नीचे लाना असंभव है. ऐसे में मणिपुर से उग्रवाद का खात्मा मुश्किल लगता है.' एक मोटे अनुमान के मुताबिक, इस राज्य में उग्रवाद के सिर उठाने के बाद अब तक कोई दस हजार लोग मारे जा चुके हैं. लेकिन गैर-सरकारी आंकड़ा इससे कई गुना ज्यादा है. दरअसल, मणिपुर लगभग दो हजार वर्षों तक एक स्वाधीन राज्य रहा है. वर्ष 1947 में ब्रिटिश शासकों की वापसी के बाद यह आजाद हो गया था. लेकिन दो साल बाद ही इसका भारत में विलय हो गया. मणिपुर के लोगों की दलील है कि उनके राजा से जबरन विलय के समझौते पर हस्ताक्षर कराए गए थे.
असम
असम में भी सरकार लंबे अरसे से अल्फा के साथ शांति प्रक्रिया शुरू करने का प्रयास कर रही है. इस मुद्दे पर संगठन दो-फाड़ हो चुका है. अध्यक्ष अरविंद राजखोवा की अगुवाई वाला गुट इसके पक्ष में है. लेकिन संगठन के सैन्य कमांडर परेश बरुआ इसके सख्त खिलाफ है. कई मध्यस्थ समितियों के गठन और कभी हां, कभी ना के बावजूद अब तक इस मामले में महज इतनी ही प्रगति हुई है कि राजखोवा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ एक बार मुलाकात की है. उसके बाद फिर सब कुछ ठप है. मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं, ‘सरकार इन उग्रवादियों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करना चाहती है. हमने कई और संगठनों के साथ भी शांति प्रक्रिया की पहल की है. उम्मीद है कि इसके सकारात्मक नतीजे सामने आएंगे.' उनका दावा है कि अल्फा के साथ जल्दी ही औपचारिक तौर पर बातचीत शुरू होगी. गोगोई का कहना है कि अल्फा के साथ बातचीत के लिए सरकार के दरवाजे खुले हैं. लेकिन वह राज्य में हिंसा के किसी प्रयास का कड़ाई से मुकाबला करेगी. राजनैतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर यह प्रक्रिया जल्दी ही आगे नहीं बढ़ी तो बातचीत समर्थक गुट के सदस्य परेश बरुआ के खेमे में लौट सकते हैं.
हाल में असम के दौरे पर गए पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जी.के.पिल्लै, जो शांति प्रक्रिया शुरू करने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं, कहते हैं, ‘अल्फा के बातचीत विरोधी नेताओं को चीन का भी समर्थन हासिल है. हालांकि चीन इसका खंडन करता रहा है.' पिल्लै का कहना था कि पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों को म्यामांर के जंगलों से खदेड़ने के लिए उस देश की सेना को मजबूत करना जरूरी है. म्यामांर की सेना इन संगठनों के खिलाफ अभियान चलाने की इच्छुक नहीं है. लेकिन उसके पास वैसी ताकत भी नहीं है. नगा शांति प्रक्रिया में केंद्र के मध्यस्थ की भूमा निभा चुके पिल्लै कहते हैं, असम के लोग अब शांति व विकास चाहते हैं. इसलिए अल्फा के प्रति लोगों का समर्थन घट रहा है.

यही है वह 'सवाल का निशान' जिसे आप तलाश रहे हैं. इसकी तारीख 22.02 और कोड 7678 हमें भेज दीजिए ईमेल के जरिए hindi@dw.de पर या फिर एसएमएस करें +91 9967354007 पर.
अरुणाचल प्रदेश और मेघालय
अरुणाचल प्रदेश अपेक्षाकृत शांत है. लेकिन उसके सीमावर्ती तीन जिलों में नगा उग्रवादी सक्रिय हैं. राज्य में अपहरण और हत्या की खबरें मिलती रहती हैं. इसी तरह, मेघालय में स्थानीय आदिवासी उग्रवादी संगठनों की गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं. बांग्लादेश के साथ सटी लंबी सीमा इन उग्रवादियों की शरणस्थली बन गई है. जिस मेघालय की गिनती पहले पूर्वोत्तर के सबसे शांत राज्य में होती थी, वह अब अशांति की राह पर तेजी से बढ़ रहा है.
आजीविका बना उग्रवाद
आखिर इलाके में उग्रवाद की समस्या का समाधान क्या है ? राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद इलाके का समुचित विकास नहीं हो सका है. अरुणाचल प्रदेश और असम की नदियों पर अगर पनबिजली परियोजनाएं लगाई जाएं तो वहां से देश के आधे हिस्से को बिजली की सप्लाई की जा सकती है. लेकिन अब तक इसके लिए बनी तमाम योजनाएं फाइलों में पड़ी धूल फांक रही हैं. इसके अलावा इलाके में पर्यटन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा सकता था. उग्रवादी संगठनों की दलील है कि विकास नहीं होने की वजह से इलाके में रोजगार के मौके नहीं हैं. नतीजतन ज्यादातर युवक इन संगठनों में शामिल हो जाते हैं. मणिपुर के पत्रकार पी चूड़ामणि सिंह कहते हैं कि दरअसल, उग्रवाद इस इलाके में आजीविका का प्रमुख साधन बन गया है. सरकार विकास नहीं होने के लिए उग्रवाद को जिम्मेदार ठहराती है और उग्रवादी सरकार को. पहले अंडा या पहले मुर्गी की तर्ज पर आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर अब तक जस का तस है. पर्यवेक्षकों का कहना है कि इलाके में कोई भी नहीं चाहता कि उग्रवाद की यह समस्या सिरे से खत्म हो जाए. उग्रवादी संगठनों से लेकर नेता सब इस समस्या से फायदा उठाने में लगे हुए हैं. ऐसे में पूर्वोत्तर में उग्रवाद की समस्या के हल होने के कोई आसार नहीं नजर आ रहे हैं.
रिपोर्टः प्रभाकर, कोलकाता
संपादनः आभा एम

नगालैंड पर हावी कोरियाई संस्कृति

नगालैंड पर हावी कोरियाई संस्कृति

भारत के पूर्वोत्तर राज्य नगालैंड और कोरिया में कौन सी चीज एक जैसी है. इस सवाल का जवाब है, कुछ भी नहीं. लेकिन नगालैंड पहुंच कर कतई ऐसा नहीं लगता. नगालैंड के किसी भी शहर में पहुंचने पर किसी कोरियाई शहर का आभास होता है.


बीते कोई छह दशक से उग्रवाद के लिए सुर्खियों में रहे नगालैंड में तेजी से कोरियाई संस्कृति हावी हो रही है. राजधानी कोहिमा के ज्यादातर घरों में अब किसी भी भारतीय चैनल के मुकाबले कोरियाई चैनल ज्यादा देखे जाते हैं. यही नहीं, बाजारों में भी कोरियाई फिल्मों की सीडी और डीवीडी की सबसे ज्यादा मांग है. नगालैंड के लगभग हर घर में इन फिल्मों की डीवीडी मिल जाएगी. राज्य में कोरियाई फिल्मों के पोस्टर भी नजर आते हैं. कोरियाई फिल्मों ने लोकप्रियता के मामले में यहां हॉलीवुड को भी छोड़ दिया है.
भारत और कोरिया के बीच नए व्यापार समझौते के बाद इस पर्वतीय राज्य में कोरियाई संस्कृति तेजी से हावी हो रही है, खासकर नगा युवकों में. अब कोरियाई कंपनियां भी इस राज्य में निवेश के प्रति दिलचस्पी ले रही हैं.कोहिमा में एक छात्रा अरेनी कहती हैं, "मुझे कोरियाई फिल्में बेहद पसंद हैं."
तेजी से हावी होती संस्कृति ने स्थानीय नगा संस्कृति और परंपराओं के लिए खतरा पैदा कर दिया है. लेकिन आखिर इसकी वजह क्या है ? राज्य के सबसे बड़े संगठन नगा होहो के एक पदाधिकारी खोनबेमा कहते हैं, "विदेशी संस्कृति के बढ़ते असर की वजह से हमारी अपनी संस्कृति खतरे में पड़ गई है. युवाओं में यह तेजी से लोकप्रिय हो रही है. लोग गरीबी के बावजूद विदेशी संस्कृति की नकल करते हुए महंगी जीवनशैली अपनाने लगे हैं. इससे हमारी पहचान खत्म होने का खतरा है. विदेशी संस्कृति अपनाने की वजह से युवा वर्ग नगा संस्कृति को भूलता जा रहा है. पारंपरिक पहनावे की जगह विदेशी कपड़ों ने ले ली है."
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि नगा लोगों में भारत सरकार के प्रति भारी नाराजगी है. वह लोग खुद को भारतीय ही नहीं मानते. ज्यादातर सरकारी योजनाएं नगालैंड के दूरदराज इलाकों तक नहीं पहुंचती. ज्यादातर लोगों के पास राशन कार्ड तक नहीं हैं. नतीजतन केंद्र और राज्य के लोगों के बीच दूरियां लगातार बढ़ रही हैं. नगालैंड में 16 जनजातियां रहती हैं. इन सबकी भाषा तो अलग है ही, इनकी सांस्कृतिक विरासत भी धनी है. लेकिन युवकों में कोरियाई संस्कृति के प्रति बढ़ते लगाव के चलते अब इन पर खतरा मंडराने लगा है. राज्य सरकार ने भी कोरियाई संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में पहल करते हुए सालाना भारतीय कोरियाई सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन शुरू किया है.
छात्र कोरियाई फैशन भी अपनाने लगे हैं. नगालैंड के दूसरे शहर ऊखा के एक छात्र जोनाह कहते हैं, "मुझे कोरियाई फिल्में अच्छी लगती हैं. इन फिल्मों को देखने के बाद ही मैंने कोरियाई संस्कृति अपनाई. मैंने इन फिल्मों के जरिए अभिनय सीखा और कोरियाई फैशन के कपड़े पहनने लगा हूं. यह लाजवाब है."
लेकिन राज्य के लोगों को लगता है कि नगा संस्कृति कोरियाई संस्कृति के आगे दबने लगी है और इसके खत्म होने का खतरा पैदा हो गया है. खोनबेमा कहते हैं, "नगालैंड में 16 अलग अलग जनजातियां हैं. इन सबकी सांस्कृतिक विरासत काफी धनी है. सरकार या दूसरे संगठन भी युवकों में विदेशी स्संकृति अपनाने की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने की दिशा में कोई कदम नहीं उठा रहे हैं. दशकों से जारी उग्रवाद ने युवकों को मुख्यधारा से अलग कर दिया है. यही वजह है कि वे आसानी से मिलने वाले कोरियाई सामानों के और फैशन के प्रति तेजी से आकर्षित हो रहे हैं. अगर यह सब ऐसे ही चलता रहा तो जल्दी ही हमारी संस्कृति और पोशाक खतरे में पड़ जाएगी. हमारी विरासत खतरे में नजर आ रही है."
ऊखा से कुछ दूर खेतों में काम करने वाली चेनमोंगी अपने इकलौते बेटे के रहन सहन में आए बदलाव से परेशान है. चेनमोंगी कहती है, "वह अजीब फैशन के कपड़े पहनता है और न जाने किस भाषा की फिल्मों की सीडी देखता रहता है. इसके लिए वह अकसर मुझसे पैसे मांगता है. मैं काफी परेशान हूं. उसका रंग ढंग ठीक नहीं लगता. लेकिन मैं क्या कर सकती हूं. उसके बाकी दोस्त भी वैसे ही हैं."
बुजुर्गों में बढ़ती इस चिंता के बावजूद राज्य के युवक-युवतियों में कोरियाई संस्कृति के प्रति दीवानगी लगातार बढ़ती जा रही है. लेकिन ऐसा क्यों? कालेज के छात्र जोना कहते हैं, "यह बेहद आधुनिक और कूल है."
रिपोर्टः प्रभाकर, कोहिमा (नगालैंड)
संपादनः ए जमाल